उनसे उनका बचपन मत छीनो।
हम खुद बढ़ा रहे हैं खर्चे।🚶
नमस्कार 🙏
राधे राधे 🥰
बच्चों का विद्यालय का नया सत्र आने वाला है । हर बार सोचता हूं कि कुछ लिखूं अभिभावकों को समझाने के लिए मगर हर बार सोचकर रह गया।
हर बार की तरह इस बार भी हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की सोचकर अच्छे से अच्छे.... ओह गलती हो गई... महंगे से महंगे स्कूल में दाखिला दिलाने की सोच ही रहे होंगे । हमारे वर्तमान समाज की सोच के हिसाब से जितना महंगा स्कूल होगा उतना ही हमारा बच्चा समाज के मानकों पर खरा उतरेगा। उतना ही ज्यादा उसका बौद्धिक स्तर बढ़ेगा या यूं कह दें कि बच्चे का तो विकास होगा या नहीं लेकिन हमारी और हमारे परिवार की दिखावटी शान जरुर बढ़ेगी। अमूमन होता ये है कि बच्चे को अगर किसी हल्के फुल्के स्कूल में दाखिला ( यहां हल्का फुल्का कम फीस वाले या सरकारी स्कूलों को बोला गया है.....जमाने की सोच के हिसाब से ) में दिला दिया तो भाईसाब हमारे रिश्तेदार हमें खिन्न भाव से देखने लग जाते हैं कि " अरे यार कैसे मां- बाप हैं बच्चे के लिए दो पैसे extra खर्च नहीं कर सकते..... घर गरीब होगा जी..... शायद बच्चों से प्यार ही नहीं है.....या फिर शायद खुद के मज़े नहीं छूट पा रहे जी..... वगैरह वगैरह। और यही एक वजह बन जाती है कि हम भी भेड़ चाल में अपने बच्चों को उनके मासूम से बचपन को छीनकर बनावटी बहुमुखी प्रतिभा के झांसे में और भारी भरकम पिट्ठू बैगों को पकड़ाकर भेज देते हैं बहुमंजिला, आकर्षक और मॉल जैसे प्रोडक्शन हाउस में जहां पर शुरुआत होती है लूटमार की, अंधाधुंध अप्रत्यक्ष मनचाही कमाई की। बच्चा सोचता है wow मजा आ गया। एकदम आलीशान बंगले की फील देने वाला कमरा, smart से teachers, water cooler का पानी , एकदम चिकना फर्श, नक्काशी दार झरोखे, विलायती टेबल कुर्सी, स्मार्ट बोर्ड, मटकते हुए बच्चे दोस्त, एकदम झक्कास कंधे पर टंगे बैग और उनके हाथों में घर से सजाकर भेजे हुए रंग बिरंगे इंपोर्टेड टिफिन जिनमें सजाकर भेजे है मां ने, ओह sorry मम्मियों ने..... क्योंकि मां कहलवाना तो आजकल लड़कियों को वृद्धावस्था feel करवाने जैसा लगता है न.....एकदम लजीज व्यंजन.....(नाम बहुत सारे हैं तो गिना नहीं पाऊंगा) जिनको लाते ही तो भाईसाब महक दौड़ जाती है classroom में और खाने के बाद तो आपके लाड़ले का हाल.... वाह वाह!
क्या life बना दी है यार बच्चों की.... विद्यार्थी कम, ट्रैवलर या पिकनिक स्पॉट पर सैर करने वाला ज्यादा लगता है।
एक वो जमाना था जहां बच्चा सिर्फ मास्टरजी से पढ़ने ही जाता था। एकदम अल्हड़पन था बालक में। न फटी पेंट की शर्म थी उसको, ना एक जोड़ी ड्रेस में पूरे हफ्ते के सात दिन निकालने में अजीब लगता था उसे। कभी कभार तो इस खाकी पेंट पर ही कोई रंगीन शर्ट पहनके शादी समारोह भी साध लिए जाते थे। टिफिन की जगह स्कूल का पोषाहार हुआ करता था। हां किसी को वो पसंद न भी होता था तो घर जाकर लंच करके आने में उसको जरा भी तकलीफ नहीं होती थी। आजकल तो भाईसाब लाड़ले जी को नौकरी जाने से पहले या तो पापा बाइक पर छोड़कर आते हैं या फिर स्कूल के कमाई के जरिए ऑटो में महीने की फीस भरके भेजा जाता है। पहले बच्चा सुबह उठते ही खुद स्वतंत्र तरीके से, अपने आत्मनिर्भरता के दम पर तैयार होता था, पैदल स्कूल जाता था और बिना मां पिताजी को तंग किए स्कूल में पढ़ाए पाठ को घर आकर दोहराता था, और फिर अगर उसमें मास्टरजी को कमी नजर आए तो आराम से डंडे खाकर आने के बाद भी हँस हँस के घरवालों को बताता था...... और सबसे बड़ी बात..... उस वक्त मां पिताजी मास्टरजी पर चढ़ने नहीं जाते थे बल्कि खुश होते थे कि स्कूल से हमारा बच्चा इंसान बनने की राह पर जा रहा है.... तबके मां बाप कहते थे... हाड़ हाड़ हमारा और मांस मांस आपका।
आज अगर बच्चे की तरफ टीचर आँख भी निकाल दे तो बच्चा खुद मोबाईल हाथ में लेके इतनी धाराएं सीख चुका है कि आधा निपटारा तो वो खुद ही स्कूल में ही करके आ जाता है और बाकी बचा हुआ मां बाप खुद करके आ जाते है।
और ऐसा करेंगे क्यों नहीं साहब, फीस भरते है... स्कूल वालों की हर मांग पर पैसे भरे जाते है, कभी कंप्यूटर सिखाने के नाम पर, कभी tour करवाने के नाम पर, कभी बहुआयामी विकास के लिए करवाई जा रही प्रतियोगिताओं के नाम पर, कभी बच्चों को विदेशी च्याऊं म्याऊं टाईप की भद्दी एक्टिंग, डांस, छिछोरे नाटकों और गानों के नाम पर तो कभी dress अचानक से बदल देने के नाम पर ....... स्कूल नहीं थिएटर हो गए..... अरे भई पढाई के लिए स्कूल होते हैं यार तो बच्चों को सिर्फ पढाई करने दो ना। मैं प्राइवेट या सरकारी किसी एक तंत्र के विपक्ष या पक्ष में नहीं हूं बल्कि कहने का तात्पर्य यह है कि जिस आयु के लिए जो चीज़ बनी है उसे वही करने दो ना। स्वतः विकास होने दो ना। जहां बच्चे के कंप्यूटर सीखने की उम्र 15 वर्ष के बाद की है वहां वही चीज उसे आप दस की उम्र में करवाओगे तो उसका बालपन तो वैसे ही खत्म हो गया ना। पहली हम खुद उसको समझदार बना रहे हैं और फिर हम खुद कहते हैं बच्चे बिगड़ रहे हैं। उन highclass प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने से ना सिर्फ बच्चे पर फर्क पड़ रहा है बल्कि महंगाई के इस दौर में एक बच्चे का लालन पालन भी बड़ा भारी लगने लगा है। जहां दो दशक पहले तक परिवार के पांच बच्चे भी मात्र 1000 रुपए फीस और 1000 रुपए की ड्रेस और स्टेशनरी में पूरे साल की पढाई कर लिया करते थे, वहीं आज लाख रुपए खर्च कर देने के बाद भी ना तो बच्चे में वो संस्कार, पढ़ाई के गुर आ पाते हैं बल्कि साथ ही साथ इस दिखावे के चक्कर में लोग महंगाई का रोना रोते नज़र आते हैं।
अरे जब परिवार को चलाने के बजाए आप आधा हिस्सा सिर्फ दिखावटी पन में ही खर्च कर दोगे तो पैसे कोई पेड़ के फलों की तरह गिरेंगे नहीं ना।
आज के इस समाज की दौड़ में दौड़ो लेकिन सच्चाई को अंगीकार करके।
एक तरफ तो बच्चों को बचपन में प्राइवेट की पढ़ाई दी जाती है और ज्योंहि बच्चा बारहवीं में आता है तो उसको सरकारी संस्थानों जैसे IIT, AIIMS, IIM, NIT, IISC, DAE, ISRO आदि में दाखिला दिलाने की कवायद में लग जाते हैं। क्यों भई? जब सरकारी में कमी लगती थी तो अब क्यों इन सरकारी संस्थानों में दाखिले दिलवाए जा रहे हैं। अब नहीं होगी तुम्हारी नाक नीची, अब समाज के सामने प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगी।
इसका जवाब हम सब जानते हैं। ये भेद हमें बखूबी पता है। अरे तो जब पता है तो बचपन से ही बच्चे को उसी सरकारी की लत लगाओ ना। या अगर सरकारी इतना ही गंदा लगता है तो कम से कम प्राइवेट में भी उस स्कूल में रखो जो सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देने वाला हो, ना कि आपकी जेब और बच्चे के कांधे पर बोझ बढ़ाने वाला हो।
अपनी विकृत सोच को बदलने की कोशिश करें। महंगाई बढ़ेगी, नेता जेब खुद की भरेंगे, भ्रष्टाचार बढ़ेगा, सरकारें नए नियम लगाएगी, हमारे बच्चों का भविष्य खराब होगा... ये होगा, वो होगा। ये सब फालतू बातें हैं यारों। सबको पता है कि जो होना है होकर रहेगालेकिन कम से कम हम जो बदल सकते हैं उसको तो बदलने की कोशिश कर लें। सरकारी विद्यालयों के लगभग 70% बच्चे रोजगार प्राप्त करते हैं क्योंकि वो विपरीत परिस्थितियों में बढ़ना सीखे हैं जबकि मल्टीस्टोरेज हाउस में पढ़ने वाले आधे से ज्यादा बाद में उच्च सरकारी शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए भी धक्के खाते दिखाई देते हैं। बच्चा डिमांड आगे से नहीं करता है, बल्कि अभिभावक खुद उसके आगे लजीज व्यंजन परोसता है। जब बचपन में बच्चा रोता है तो मां मोबाईल पकड़ा देती है, बड़ा होता है तो बाप बाइक सिखा देता है, बच्चे को तो पता भी नहीं होता की पानी की बॉटल महंगी है या सस्ती पर उसको महंगी milton की बॉटल और महंगी accesories का आदी बना दिया जाता है तो बच्चा अपनी आत्म प्रतिभा को भूलकर फिर दूसरों के इशारों पर तो चलेगा ही सही ना और फिर सीमित परिवार रखने की इन्सान तो सोचेगा ही सही ना। अरे! पहले कम से कम उनको पढ़ने तो दो फिर तो वो खुद ब खुद ही हर तरह के भेद करना सीख जाएगा ना।
भविष्य अतीत से कठिन ही होता जाता है और पैसा दुनिया में जीने की पहली ताकत बनती जा रही है ( पहले के जमाने में परिवार) इस बात को ध्यान रखते हुए अपने बच्चों का नए शिक्षा सत्र में सही निर्णय लेकर विद्यालय चयन करवाएं। बच्चे को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उसे कितनी महंगी चीजों से पाल रहे हैं। उसे सिर्फ फर्क पड़ता है तो परिवार के प्यार का, अपने मां बाप के द्वारा उसके लिए निकाले गए समय का और सुसभ्य अध्यापकों का।
बच्चे को ज्ञान के मंदिर में भेजिए ना कि 5 स्टार ऐशो आराम वाले स्कूल्स में। आप ही उसे बना सकते हैं और आप ही बिगाड़ भी सकते हैं।
आगे जारी रहेगा.........
जय हिंद
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फोटो गूगल बाबा से साभार 😊
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नेमीचंद मावरी 'निमय"
बूंदी, राजस्थान
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