बीते हुए साल से नए साल का प्रश्न: -
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अरे ओ बीते हुए साल !
क्या तुमने देखे है
अस्मिता के कुछ साक्ष्य
इस क्रूर समाज के आइने में
झांके हो क्या कभी?
तुम अगर कहते हो अपनी कहानी
तो मैं प्रवेश करूँ
काल के नए तुरुप के
इक्के के रूप में,
बनाऊँ अपने लिए
एक टिकाऊ घरौंदा।
वैसे हस्तक्षेप का मुझे कोई
अधिकार तो नहीं,
मगर अपने अस्तित्व को
दाँव पर लगाने से पहले,
थोड़ा ठहर कर सोच लूँ
ताकि अफ़सोस ना रह जाये
कोई मलाल ना हो
अपने भविष्य में।
कहीं तुम किसी कलंक के
भागीदार तो नहीं हो,
एक लुटती हुई अबला के
मौन दृष्टा तो नहीं बने ना तुम?
क्या तुमने कभी अबोध को
अपनी बाल्यावस्था में
बोध पाने के लिए
विवश होते देखा है?
क्या तुमने एक बेटे के हाथों
अपनी जननी को लाचारी का
दंश देते देखा है?
क्या तुम भी भुगतभोगी हो
इस हर निर्मम, निर्दयी, विध्वंसक पहलू के?
निष्प्राण तो नहीं हो गए हो तुम?
आतंक से त्राहि- त्राहि तो
नहीं करने लगे थे ना तुम?
एक बेटी की चीख के क्षण पर
तुम तो शकुनि नहीं बन गए थे ना?
अरे ओ बीते हुए साल !
क्या तुम मज़बूर होकर जा रहे हो
जाओ मगर अपनी
सच्चाई बताकर जाओ सखा
क्योंकि आज अगर तुम यूँ
मौन होकर चले गए
तो मेरे अनुचर भी इसी तरह
मुझसे बिना जवाब सुने ही
हर बार आते रहेंगे
बदलाव का पुरोधा बनकर
और जाते रहेंगे हर बार
मेरी और तुम्हारी तरह
लाचार, मजबूर, बेबस
और असह्य दर्द लेकर।
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🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
कविता मौलिक व स्वरचित है
नेमीचंद मावरी "निमय"
सदस्य, हिंदी साहित्य समिति,
बून्दी, राजस्थान
अस्मिता के कुछ साक्ष्य
इस क्रूर समाज के आइने में
झांके हो क्या कभी?
तुम अगर कहते हो अपनी कहानी
तो मैं प्रवेश करूँ
काल के नए तुरुप के
इक्के के रूप में,
बनाऊँ अपने लिए
एक टिकाऊ घरौंदा।
वैसे हस्तक्षेप का मुझे कोई
अधिकार तो नहीं,
मगर अपने अस्तित्व को
दाँव पर लगाने से पहले,
थोड़ा ठहर कर सोच लूँ
ताकि अफ़सोस ना रह जाये
कोई मलाल ना हो
अपने भविष्य में।
कहीं तुम किसी कलंक के
भागीदार तो नहीं हो,
एक लुटती हुई अबला के
मौन दृष्टा तो नहीं बने ना तुम?
क्या तुमने कभी अबोध को
अपनी बाल्यावस्था में
बोध पाने के लिए
विवश होते देखा है?
क्या तुमने एक बेटे के हाथों
अपनी जननी को लाचारी का
दंश देते देखा है?
क्या तुम भी भुगतभोगी हो
इस हर निर्मम, निर्दयी, विध्वंसक पहलू के?
निष्प्राण तो नहीं हो गए हो तुम?
आतंक से त्राहि- त्राहि तो
नहीं करने लगे थे ना तुम?
एक बेटी की चीख के क्षण पर
तुम तो शकुनि नहीं बन गए थे ना?
अरे ओ बीते हुए साल !
क्या तुम मज़बूर होकर जा रहे हो
जाओ मगर अपनी
सच्चाई बताकर जाओ सखा
क्योंकि आज अगर तुम यूँ
मौन होकर चले गए
तो मेरे अनुचर भी इसी तरह
मुझसे बिना जवाब सुने ही
हर बार आते रहेंगे
बदलाव का पुरोधा बनकर
और जाते रहेंगे हर बार
मेरी और तुम्हारी तरह
लाचार, मजबूर, बेबस
और असह्य दर्द लेकर।
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कविता मौलिक व स्वरचित है
नेमीचंद मावरी "निमय"
सदस्य, हिंदी साहित्य समिति,
बून्दी, राजस्थान
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