एक सैनिक की विधवा अपनी विरह व्यथा को इस गीत के माध्यम से अपने मन का हाल बता रही है।
राजस्थानी गीत
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आंख्यां रो काजल धोलौ पड्यो
आंगणिये आई जे थारी अर्थी।
कुंकुम भी या पिया थारी याद म
लागे है काली ऐ पड़ी।
झुमक्यां ये सूना री अब लागण लागी कथीर
बिचियाँ अब आंगळ्यां ने काठण लागी घणी
चुडयां भी अब खनके कोनी टूट टूट होगी गरी,
जीवड़ो कसमसा गयो आँसू री लागी रे झड़ी.......
मोडो पूँछे रोजीना कि पापा कद घरां आवला
मोडि थारी ओल्यु म दरवाजे पे कद सुं खड़ी
दौउं टाबर अब संभाल्यां भी संभले कोनी,
हालीडो अब खेतां म बाजरो बोवे कोनी।
थारे संग बीती राताँ का अब काला सपणा आवे है
पल पल बीते है ज्यूँ पिया बरसाँ सा लगता जावे है,
जामण थारी टाबर ने अब बंदूक थमावेगी,
बदलो लेवण खातिर ने अब गाउँ री पूरी फ़ौज खड़ी।
दुसमण ने धूळ चतावण री अब लागे है आई घड़ी।
जीवड़ो कसमसा गयो अब आँसू की लागे है झड़ी....
नेमीचंद मावरी "निमय"
MNIT, jaipur
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