Nemi Chand Mawari “Nimay”
(Poet and writer)
जब ईश्वर ने हमें इतना परिपूर्ण संसार दिया है कि हर देवता तक इस धरती पर आने के लिए, जन्म लेने के लिए स्वर्ग से भी अधिक गौरव महसूस करते हैं, जब बड़े बड़े ऋषि महात्मा इसी संसार में आकर अपना नाम अमर कर गए, उस सनातन काल से लेकर आधुनिक काल तक हर किसी ने जो शिद्दत से चाहा, उसे पूरा कर दिखाया तो हम क्यों छोटी सी समस्या से हार जाते हैं, क्यों अपनी एक छोटी समस्या को बहुत बड़ी परिस्थिति बता दूर भागने लगते हैं?
धरती जब गर्मी की तपन से सूखने लगती है तो नई आशाओं का संसार बनाने लगती है कि मेघ आएँगे, जल बरसाएँगे और फिर से मुझे पूर्ण कर देंगे। जब पतझड़ आता है तो प्रकृति के यौवन को लूटकर चला जाता है लेकिन प्रकृति उदास नहीं होती, त्राहिमाम नहीं करती बल्कि नये की आस में पेडों को अपनी जमीं पर मूलसहित टिकाए रखती है जब तक सावन की फुहारें नहीं आ जाती, लेकिन आशाएँ जब स्वयं प्रकृति नहीं छोड़ती तो हम क्यों हर बात पर निराशा से घिर जाते हैं ?
हर इंसान चाहता है कि उसे अपने सपनों का संसार मिले, उसे हर वो सुख-सुविधा मिले जो उसके साथ के लोगों को मिल रही है, जो उसके अन्य परिजनों को मिल रही है, जो उसी के साथ बढ़ने वाले सफल व्यक्ति को मिल रही है लेकिन दोस्तों जीवन में यदि इंसान की यही महत्वाकांक्षी प्रवृत्ति बनी रहे तो वो स्वतः ही मरने लग जाएगा क्योंकि उसे अपने वर्तमान का तो भान ही नहीं है और जो वर्तमान को जीना छोड़ भविष्य की उधेड़बुन में लग जाता है वो कभी ना तो अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब हो पाता है और ना ही परमार्थ के लिए अपने आप को तैयार कर पाता है।
यदि जीवन में अपने आपको जीतने के लिए तैयार करना है तो हजार बार हार को सहर्ष स्वीकार करने का सामर्थ्य तो अपने आप में विकसित करना ही पड़ेगा क्योंकि फल वही मीठा होता है जो हजार तूफ़ानों, लगातार बारिशों और विपरीत परिस्थितियों को सहन कर पेड़ की डाली से पकने के बाद जमीं पर गिरता है। हमें तो ईश्वर ने पूर्ण रूप से तैयार होने की समझ भी दी है फिर भी हम नादान बन अपने आपके साथ ही प्रतिस्पर्धा में लगे रहते हैं और अपने खुशनुमा लम्हों की कद्र किए बिना जुट जाते हैं अंधी दौड़ में। जो हमें मिला है वो अगर हम हँसकर स्वीकार कर रहे हैं , उसी में संतोष कर रहे हैं तो आपको दुनिया की कोई ताकत नीचा नहीं झुका सकती, आपको कमजोर नहीं कर सकती।
संतोष का तात्पर्य ये कतई नहीं कि आपको जो मिला है उसी को बैठे-बैठे मजे लेकर खाते जाओ बल्कि संतोष वो है कि कर्म करने के बाद भी दूसरों को देख जलो नहीं बल्कि खुश रहकर अपने जीवन के हर लम्हे की कद्र करो और जीओ।
15
Feb,2020

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