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हम शायद अंतिम पीढ़ी होंगे
जिसके एक बहुत प्यारी सी मासूम सी मां है।
हाँ! वो माँ जो नहीं जान पाती
हमारी आधी से ज्यादा सच्चाईयों को,
जो बस हमारे किसी बोले झूठ पर
हमेशा आशीर्वाद देती है।
जो समझ नहीं पाती हमारे
चार दिन चल पाने वाले रिश्तों की बुनियाद को,
फिर भी सदा उन रिश्तों को
बंधे रहने का आशीर्वाद देती है
इस माँ को ना हमारा स्मार्टफोन खोलना आता है
ना किसी पासवर्ड को याद रखने की सोचती है
ना इस माँ का कोई अकाउंट चलाना आता है
ना किसी बैंक बैलेंस से कोई मतलब होता है
हाँ! हम शायद अंतिम पीढ़ी होंगे
जिसके एक बहुत प्यारी सी मासूम सी मां है।
जिसको शायद अपना जन्मदिन भी
कभी याद नहीं रहता मगर
हमारे सिर्फ एक बार कह देने पर
हमारे जन्मदिन का बेसब्री से इंतजार करती है।
जो हमारे हर बहाने को भी
हमारा नटखटपन मान हँसती हँसाती रहती है ।
जो पापा के डाँटने पर
झट से सारे बंधन को एक तरफ कर
दो-दो हाथ करने पर भी उतारू हो जाती है।
ना कभी पब देखा उसने ना कोई सिनेमा हॉल,
लेकिन फिर भी जमाने के सारे अनुभवों से
परिचित करवाने की कला उसके पास
पता नहीं कहाँ से आ जाती है ?
हाँ हम शायद अंतिम पीढ़ी होंगे
जिसके एक बहुत प्यारी सी मासूम सी मां है।
जो दस रुपये की कहने पर
पूरा सौ का नोट निकाल कर हाथ में थमा देती है।
जो बिना कारण पूछे
हमें आजादी के आसमाँ में खुला छोड़े रखती है।
ना उसको अपनी साड़ी की फिक्र है
ना उसे किट्टी पार्टियों में जाने का शौक है
वो तो बस अपनी बहु और अपनी नखरेल बेटी को ही सजाने संवारने में वक़्त देती रहती है
बहुत मासूम है हमारी पीढ़ी की माँ
जो हमारे एक खरोंच आ जाने पर झट से रो जाती है,
और बस ज़रा सा शरीर तप जाने पर आँचल में छुपाकर सो जाती है।
सर्वाधिकार सुरक्षित:-
नेमीचंद मावरी "निमय "
बूंदी, राजस्थान
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