गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

गुहार नए साल से

 "गुहार"

(मौलिक व स्वरचित छंद मुक्त काव्य)




वक़्त बहती हुई नदिया की तरह 

चला जा रहा है, 

और सरसब्ज खुशियों की बगिया 

जैसे वक़्त की धारा के 

चले जाने के ग़म में 

वीरान होने को आमादा है। 

शायद भूत का असर, 

या डरावने भविष्य की 

भाव भंगिमा प्रतीत होने लगी हो।

जो घाव भूत से मिले 

वो गहराएंगे या मरहम लगेगा 

ये तो भविष्य तय करेगा ही, 

परंतु शोक के मौसम को 

संतृप्त कर, 

आह्लाद में बदलना 

वक़्त की ही तो माँग रही है 

फिर हाथ उठने चाहिए 

प्रार्थना में, 

बस यही है वश में मनुज के।

ऐ  नव आगंतुक नववर्ष !

तेरे ही कंधों पर है सारा भार।

वक़्त को दरियादिल बनाना है, 

या फिर से छेड़ना है विलाप। 

प्रारब्ध भी तुझे ही तय करना है 

और दिशा भी,

ताकि पीढ़ियों तक तेरा नाम 

कलंकित बीते वर्ष के साथ 

नफरत के साथ ना जोड़ा जाये। 

अलविदा बीते वर्ष!

जाना मगर अपने किए का 

हिसाब पूरा चुकता करके ।

🖋❣❣❣❣❣

नेमी चंद मावरी "निमय"

कवि, लेखक व रसायनज्ञ 

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