"आ भी जाओ मोहन" (कृष्ण विरह गीत)
(मौलिक व स्वरचित)❣🥰
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मोहिनी मूरत देखन को कबसे तृषित हैं ये नयन,
चंचल छवि के दर्शन देने अब आ भी जाओ मोहन।
तन-मन मेरा कहाँ रहा
अब भूल रहा हूँ सुध- बुध,
तेरे चरण पकड़ने की
अब मन ने कर ली है जिद्द,
तेरे नाम की ही महिमा में मैं तो हो गया मगन,
चंचल छवि के दर्शन देने अब आ भी जाओ मोहन।
ज्यों-ज्यों ढलती जाये रैना
त्यों-त्यों साँसें बढ़ती जाए,
अपने मोहन की खातिर में
कोई कमी ना रह जाए,
तेरी चौकीदारी करते बस कट जाए सारा जीवन,
चंचल छवि के दर्शन देने अब आ भी जाओ मोहन।
हर पद में अब मोहन की ही
महिमा का मैं गुणगान करूँ,
भाग मेरे भी ऐसे लिखना
मैं भी माखन मिश्री का पान करूँ,
जग का सब भोग निरर्थक बस मिल तेरी झूठन,
चंचल छवि के दर्शन देने आ भी जाओ मोहन।
ना चरणों की रज में कान्हा
ना जाने से बृज में,
मेरे मन की प्यास मिटेगी केवल,
जब मिल जाऊँगा तुझमें,
कान्हा तड़प लगी है ऐसी कि तोड़ दूँ सारे बंधन,
चंचल छवि के दर्शन देने आ भी जाओ मोहन।
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सर्वाधिकार सुरक्षित 😊
नेमी चंद मावरी "निमय "
कवि, लेखक व रसायनज्ञ
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