""तमाशेकार डर""
(मौलिक व स्वरचित कविता)
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डर बियाबान जंगलों का नहीं
डर तो उनमें एकाध बनी निर्जन इमारतों का है
जो प्रकृति का आनन्द लेते वक्त भूतहा महसूस कराती है।
डर काली रातों का नहीं
डर तो उन उजालों का है,
जो काली करतूतों के गवाह बनकर झकझोर देते है,
क्योंकि उनमें विस्तार दिखता है और रातों में एकान्त शांति।
डर नासमझी से नहीं हैं,
डर तो उस समझदारी से है जो रास्ता दिखाकर भी अकेला छोड़ देती है।
डर बेवकूफी से भी नहीं है,
डर तो उन अनुभवों का लगता है
जो भूत में बीत चुके मगर लागू किए जा रहे हैं अब तक
बेवजह, उद्देश्यहीन।
डर झोंपड़ पट्टी से भी नहीं है,
डर तो उन आलीशान बहुमंजिला इमारतों से है,
जो व्यंग्य बाण छोड़ कर नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ती।
डर किसी की लाचारी से भी नहीं है,
बल्कि डर तो उस उड़ान से है
जो अट्टहास करती नजर आती है और सहज को भी असहज बना देती है पल भर में।
डर सन्नाटों का नहीं है,
डर तो उस क्रंदन, आलाप विलाप
चीत्कार और रुग्ण पुकार का है जिसे इंसान ने अपनी प्रगति का आधार बना रखा है।
हाँ! डर दिखता है ना
जब टटोल कर देखते हैं नाजुक वक़्त को,
और उससे पैदा हुए जज़्बातों को।
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सर्वाधिकार सुरक्षित
नेमी चंद मावरी "निमय "
कवि, लेखक व रसायनज्ञ
बूंदी, राजस्थान
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