मंगलवार, 4 जनवरी 2022

"आखिर हम कर क्या रहे हैं" (जिंदगी का काला सच)





प्रिय दोस्तों 

शुभ प्रभात...😊

इस कड़कड़ाती सर्दी में सब लोग गर्मागर्म चाय का मजा ले रहे होंगे ना! सब बैठे होंगे रजाई में दुबक कर। सोच रहे होंगे आज के पूरे दिन के कामों के बारे में। 

खैर!

जितना सोचा तेरे बारे में,

उससे कहीं ज्यादा निकला जिंदगी तेरा सच...

जहाँ तन्हाइयों को काटने के लिए पूरा परिवार एक साथ हुआ करता था, 

जहाँ सुबह की चाय के समय चूल्हे के पास बैठकर पूरे दिन की योजना पर विचार-विमर्श किया जाता था, 

जहाँ दादाजी की खाट के चारों तरफ बच्चे मस्तियाँ करते रहते थे, 

जहाँ ताऊजी, चाचाजी बुआ सब मिलकर बच्चों को डाँटा करते थे, 

वो संसार जैसे भूत में लुप्त हो गया है और जीने लगे हैं सब के सब एकाकीपन में। 

उस परिवार में भले ही कमाई सरकारी नहीं थी लेकिन अपने 5 बीघा के खेत में से होने वाली फसल उन 20 लोगों का पेट पालने के लिए काफी होती है 

आज 20 घण्टे की कमाई भी 5 लोगों के पेट को पालने के लिए कम पड़ रहीं है। 

उस परिवार में बच्चों को पालने वाली दादी कभी मुँह नहीं मोड़ा करती थी, 

लेकिन आज दादी की जगह किराये की 2- 2 आया भी बच्चों को कोई संस्कार नहीं दे पा रही है। 


हम खुशनसीब समझते हैं ना खुद को कि अरे वाह! हमारी 50 हज़ार की नौकरी  में 4000 का increament लगने वाला है,  हम विदेश भ्रमण पर जाने वाले हैं या कोई सम्मान मिलने वाला है। 

अरे इस सम्मान से तो लाख गुना अच्छा था दादाजी के 5 मिनट पैर दबाकर " जुग- जुग जियो मेरे लाल " वाला वो पाँच अक्षर का आशीष मंत्र।

लाखों की कमाई से लाख गुना अच्छी थी वो एक दो रुपए का पुरस्कार राशि जो हमें पापा और मम्मी के कमर दर्द होने पर अपने पैरों से दबाने पर मिल जाती थी। 


जिनको हँसाने की ख्वाहिश थी, 

उन्हीं को आँसू देते जा रहे हैं, 

रहना था जिनके साथ उम्र भर,

उन्हीं को वृद्धाश्रम भेजे जा रहे हैं। 


हमारे माँ बाप जहाँ हमें पाल पोसकर , पढ़ा लिखा कर हमारे पैरों पर खड़ा करते हैं वही हम उन्हीं पैरों से उन बुढ़े माँ बाप के सपनों को,  उनकी ख्वाहिशों को रोंद देते हैं। 

समाज आखिर जा किस दिशा में रहा है यार? 

घर में पाँच सदस्य हैं तो पाँच के पाँच ही नौकरी करने वाले होना चाहिए। 

आखिर क्यों यार?

जब एक या दो सदस्यों की कमाई से घर चल ही रहा है तो सब के सब घर से बाहर क्यों?

लेकिन इसके पीछे ना एक काला सच है और वो ये कि हम तो बचपन से ही ये निश्चित करने लग जाते हैं ना कि हमें सिर्फ अकेले ( अपनी पत्नी, दो बच्चे) एकल परिवार बनाकर रहना है पूरी जिंदगीभर और उसके लिए जरूरी है नौकरी लगना। 

मतलब हमने पहले से ही योजना बना ली कि हमें बस संयुक्त परिवार रखना ही नहीं है। 

अकेले-अकेले की रज़ाई होनी चाहिए, 

अकेले-अकेले चाय पकौड़े खाने हैं ,

अकेले-अकेले घूमने जाना है 

और अकेले- अकेले ही घुट घुट के मरते रहना है। 


हाय रे समाज! कैसा पंगुपन आता जा रहा है यार!

अपना भाई मीलों दूर कहीं ओर जगह नौकरी कर रहा है, 

किसी ओर का भाई तुम्हारे साथ नौकरी पर है, 

उसका भाई कहीं विदेश में व्यवसाय कर रहा है, 

उसके माता पिता कहीं ओर है 

और वो तुम्हारे माता-पिता से ही खुश हो रहा है,

हमारी बहन को भाई के रूप में एक अच्छे मित्र की तलाश है,

वो हमसे मिलने, बैठकर मस्तियाँ करने को बेताब है, 

अपनी ख्वाहिशों को साझा करने के लिए तरस रही है लेकिन हमें किसी ओर की बहन के लिए फुर्सत निकालने के ही वक़्त निकालना है।

आखिर चल क्या रहा है यार ये ! हमारे हर निजी रिश्ते बहुत दूर- दूर हो चुके हैं, 

और किसी ओर के निजी रिश्तों में ही हम अपनापन ढूंढ़कर जिंदगी निकाल रहे हैं। 

आधी जिंदगी तो हमने अपने सपनों को पाने के लिए पढ़ने में निकाल दी जिसके लिए माँ हमेशा टिफिन बनाती नज़र आई, पापा extra काम करके पैसे जोड़ते नज़र आए और हमारे जीवन के 21 बरस सिर्फ पढ़ाई में गुजर गए। जिसमें सुबह से शाम बाहर रहना ही रहा और फिर आधी जिंदगी अपनी नौकरियां करने में निकलते गए,जिसमें भी सबसे दूर ही रहते रहे और हो गए साहब 60 साल पूरे जब घुटने जवाब देने लगे,  10 तरह की दवाइयाँ चालू हो गयी, किसी ओर पर निर्भर हो चले........तो फिर आखिर हम अपने परिवार के साथ जिये ही कब?


कहने को हम अपने परिवार के सपने पूरे कर रहे हैं 

लेकिन असल में हम सिर्फ़ खुद की जिंदगी का पेट भर रहे हैं।


गांवों में तो फिर भी बूढे मां-बाप चहल- क़दमी कर अपने दुःखों को भुलाने की कोशिश कर लेते हैं लेकिन शहरों में बेचारे माता-पिता पिता अपने बच्चे के किसी त्यौहार पर घर आने के इंतजार में अपना पूरा जीवन निकाल देते हैं। 


पढ़ाई करो,  शोध करो,  नौकरी करो, विदेश जाओ,  शादी रचाओ, और अपनी नौकरी पर ही पूरी जिंदगी निकाल आओ

यही तो है ना आज का सच। 

दिक्कत ये नहीं है कि हम नौकरी करके दूर रह रहे हैं,  दिक्कत तो ये कि हमारे वश में होकर भी हम अपने परिवार के करीब नहीं जाना चाह रहे, हमारे पास विकल्प हैं फिर भी हम दूर रहना चाह रहे हैं। 

बेहतर विकल्प होने के बावजूद भी हम एकाकी परिवार की जिद्द करे बैठे हैं।

जिनके पास विकल्प ही नहीं वो तो बहुत गिने चुने परिवार हैं परंतु तन्हाइयों की भीड़ तो वो लोग बढ़ा रहे हैं जो विकल्प होते हुए भी ना तो किसी ओर की सहायता करना चाहते हैं और ना ही कोई उदाहरण बनना चाहते हैं बल्कि रास्ते में रोड़े तक बनकर खड़े हो जाते हैं उनके जो एकाकीपन को दूर करने की थोड़ी कोशिश में लगे हुए हैं। 


खैर, हम बहुत कुछ बन चुके हैं, 

कहने को बहुत कुछ कर भी रहे हैं 

लेकिन वास्तव में देखा जाये 

तो हम सच में कर क्या रहे हैं........


बहरहाल, हमें अपनी रजाई की चिंता होनी चाहिए, माँ का पता नहीं,  रजाई में भी बैठी है या नहीं बस अपनी शरीक- ए- हयात को सर्दी नहीं लगती चाहिए।

पकौड़े तैयार होंगे या नहीं, या तुम्हें खुद को बनाने पड़ेंगे ये भी पता नहीं, लेकिन माँ ने दस दिन से एक ही रट "बच्चे आएँगे " लगाकर जो गाजर का हलवा तैयार किया था, वो खराब हो भी जाये तो तुम्हें क्या !


(मौलिक व स्वरचित )

सर्वाधिकार सुरक्षित 

नेमीचंद मावरी "निमय " 

कवि, लेखक व रसायनज्ञ

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